‘‘श्रीमघ‘‘ मघ वंश का संस्थापक
सुशीलकुमार सिंह
सहायक प्राध्यापाक (संविदा), प्रा. भा. इति. सं. एवं पुरा. अध्ययन शाला, पं. रविशंकर शुक्ल वि. वि. रायपुर (छ.ग.)
मघ लगभग द्वितीय सदी ई. से लेकर गुप्तों के अभ्युदय तक मध्य भारत की एक महत्वपूर्ण शक्ति थे, जिनकी मुद्राएं तथा अभिलेख, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश तथा छत्तीसगढ़ से समय-समय पर प्राप्त होते रहे हैं।मघांे के बारे में प्रथम ऐतिहासिक सूचना हमें वायुपुराण से प्राप्त होती है, जहां उन्हें कोसल का शासक बताया गया है।1 यहां कोसल का संबंध दक्षिण कोसल से है, जिसके अंतर्गत छत्तीसगढ़ एवं उड़ीसा का भाग आता है।जी. आर. शर्मा द्वारा कौशाम्बी में किये गये उत्खनन से मघ मुद्राएं कुषाण मुद्राओं के ऊपरी स्तर से प्राप्त हुई हैं।2 अतः इस पुरातात्विक प्रमाण ने मघों के कालक्रम को वैज्ञानिक आधार प्रदान किया है, जिससे इतना अवश्य स्पष्ट हो जाता है कि कौशाम्बी एवं उसके आस-पास के क्षेत्रों में कुषाणों के पश्चात् मघों ने अपनी सत्ता स्थापित की।इसके सम्भावित कालक्रम के निर्धारण हेतु इनके द्वारा जारी किये गये अभिलेखों में प्रयुक्त तिथि, उनकी लिपिगत विशेषता तथा मुद्रा लिपि के तुलनात्मक अध्ययन को भी आधार बनाया जा सकता है, जो लिपिशास्त्र का विषय है।
प्रस्तुत शोध पत्र में मघवंश के संस्थापक पर प्रकाश डालने का प्रयास किया गया है। इस संदर्भ में अजयमित्र शास्त्री द्वारा मघ मुद्राओं की कौशाम्बी निधि के प्रकाशन के पूर्व भीमसेन को मघ वंश का प्रथम राजा स्वीकार किया जाता था।अजयमित्र शास्त्री ने उपरोक्त मघ मुद्रा निधि को कौशाम्बी होर्ड आफ मघ क्वायंस के नाम से प्रकाशित किया।इस निधि से प्राप्त एक ऐसे सिक्के का उल्लेख शास्त्री ने किया है जिस पर ‘महाराजमघ‘ लेख होने की बात कही है।3 इसे इन्होंने मघ वंश का प्रथम शासक स्वीकार कया है।इस संदर्भ में छत्तीसगढ़ राज्य के बिलासपुर जिले में स्थित मल्हार से प्राप्त ‘मघसिरि‘ अथवा ‘सीरियमघ‘ लेख युक्त मुद्राओं को भी प्रस्तुत किया जा सकता है।4 कुछ मघ सिक्को ंका उल्लेख परमश्वरी लाल गुप्त ने भी किया है, जो उन्हें कौशाम्बी से मिली थी।उन परमुद्रालेख ‘राजाम‘ तथा ‘श्रीम‘ प्राप्त होता है।5 मल्हार से ज्ञात सिक्कों पर उत्कीर्ण लेख ‘सीरिय‘ पर विचार करते हुए परमेश्वरी लाल गुप्त ने इसे सम्मान सूचक ‘श्री‘ माना है।6 जिसे स्थानीय क्षेत्र में ‘सीरिय‘ नाम से अभिहीत किया जाता था जो दक्षिण कोसल क्षेत्र में प्राकृत भाषा के प्रभाव का द्योतक है।यद्यपि इनके साथ किसी भी राजकीय उपाधि का प्रयोग कौशाम्बी क्षेत्र स ेप्राप्त मुद्राओं की भांति नहीं किया गयाहै। ऐसा संभवतः इसका कारण हुआ होगा कि श्रीमघ अपने राजत्व काल के प्रारम्भिक दिनों में इन मुद्राओं को जारी किया हो। इस संदर्भ में यह ध्यातव्य है कि इस क्षेत्र से ज्ञात समकालीन बहुत सी मुद्राओं जैसे सपीलक आदि पर राजा के नाम के साथ किसी उपाधि का प्रयोग नही ंकिया गया है।
अतः यह भी हो सकता है कि श्रीमघ ने उसी परम्परा का अनुसरण किया हो क्योंकि हमें मुद्राशास्त्र के इतिहास में ज्ञात है कि शासकों द्वारा वजित दूसरे क्षेत्र में जारी किये जाने वाले सिक्के वहां की परम्परा के अनुरूप ढाले जाते थे। इसका उदाहरण चन्द्रगुप्त द्वितीय द्वारा मालवा क्षेत्र विजय के उपरांत वहां शक मुद्रा परम्परा में रजत सिक्कों के प्रचलन किये जाने से प्राप्त होता है। इसी प्रकार का उदाहरण हिन्द-यूनानी तथा शक-कुषाण शासकों के सिक्कों में भी प्राप्त होता है जो एक ओर जहां क्षेत्र विशेष से सम्बन्धित ग्रीक लिपि, भाषा एवं ग्रीक देवता को मुद्रा पर स्थान दिया वहीं भारतीय क्षेत्र के विजयो परांत जारी किये गए मुद्राओं पर इस क्षेत्र में प्रचलित ब्राह्मी लिपि, खरोष्ठी लिपि तथा प्राकृत भाषा को भी स्थान दिया।जहां तक मघ वंश के संस्थापक ‘श्रीमघ‘ के नाम के साथ ‘श्री‘ शब्द जुड़े होने का प्रश्न है तो इस पर कोई विशेष तर्क-वितर्क करने का प्रश्न नहीं है क्योंकि कुछ ऐसा ही प्रमाण हमें गुप्त राजवंश के सस्थापक श्रीगुप्त के रूप में प्राप्त होता है, जिसके नाम के पूर्वभी ‘श्री‘ शब्द जुड़ा हुआ है। इसके साथ ही प्रयाग प्रशस्ति7 में समुद्रगुप्त द्वारा अपने तथा अपने पूर्वजों के नाम के पूर्व ‘श्री‘ शब्द का प्रयोग किया गया है। यहां तक कि चंद्रगुप्त प्रथम की महारानी कुमारदेवी के नाम के पूर्व भी सम्मान सूचक शब्द ‘श्री‘ संलग्न है, जो राजा-रानी प्रकार के सिक्कों से ज्ञात होता है।8 इसके साथ ही सम्मान सूचक ‘श्री‘ शब्द अधिकांश सातवाहन शासकों के नाम के पूर्व भी प्रयुक्त हुआ है। जैसे-श्रीसातकर्णी, श्री यज्ञसातकर्णी, श्रीविजयसातकर्णी, श्रीपुलमावी आदि।9 ऐसा संभवतः राजा को आदर एवं सम्मान देने के लिये किया गया है। आज भी हम अपने से बड़ों के नाम के पूर्व ‘श्री‘ सम्मानसूचक शब्द का प्रयोग करते हैं, जो अनादि काल से एक परम्परा के रूप में चला आ रहा है।
अतः इस प्रकार उपरोक्त विवेचन एवं विश्लेषण के आधार पर ‘श्रीमघ‘ को मघवंश का संस्थापक स्वीकार कर सकते हैं। इसके वंशजों ने पुराणो ंमें उल्लिखित कोसल क्षेत्र जिसका समीकरण दक्षिण कोसल से स्थापित किया जाता है, से लेकर उत्तर में कौशाम्बी एवं उसके आस-पास के क्षेत्रों पर कुषाणों के बाद तथा गुप्तों के अभ्युदय तक शासन किया।
संदर्भ
1. वायुपुराण (अनु. आर0 त्रिपाठी शास्त्री), पृ. 957
2. शर्मा, जी. आर. एक्सकवेशन ऐट कौशाम्बी, पृ. 85
3. शास्त्री, अजय मित्र, कौशाम्बी होर्ड आॅफ मघ क्वायंस, पृ. 39-40
4. न्यूमिसमेटिक डायजेस्ट, भाग-9, अंक-1 और 2, पृ. 34-40, मजुमदार, सुष्मिता बोस, लोकल क्वायंस आफ एंशियण्ट इण्डिया ए न्यू सीरीज-क्वायंस आॅफ मल्हार, पृ. 6-10
5. जे. एन. एस. आई. भाग-38, पृ. 52-53
6. न्यूमिसमेटिक डायजेस्ट, भाग-14, पृ. 10-11
7. गुप्त, परमेश्वरीलाल, प्राचीन भारत के प्रमुख अभिलेख, भाग-2, पृ. 9
8. अल्तेकर, ए. एस., गुप्तकालीन मुद्राएं, पृ. 24
9. गुप्त, परमेश्वरीलाल, भारत के पूर्व-कालिक सिक्के, पृ. 335
Received on 10.02.2014 Modified on 28.02.2014
Accepted on 13.03.2014 © A&V Publication all right reserved
Int. J. Rev. & Res. Social Sci. 2(1): Jan. – Mar. 2014; Page 95-96